आधुनिक युग मे संख्याओ का अद्वितीय रूप तथा उनका महत्व
Main Article Content
Abstract
संख्याओ की उत्पत्ति और प्रयोग कब और कैसे शुरू हुआ यह कह पाना बहुत कठिन है। यह तो कल्पना ही की जा सकती है कि मनुष्य जब आदिवासी जीवन से उन्नत हो, संपन्न हुआ और उसे अपने मवेशी, धन, संपत्ति, पेड़, पौधे आदि की गणना करने की आवश्यकता महसूस हुई तभी से संख्याओ का जन्म हुआ होगा। इतिहास से हमे ज्ञात होता है कि शुरू के दौर मे अंकों का आकार व प्रकार आज उपयोग होने वाले अंकों से बहुत भिन्न था। यह बड़े गर्व का विषय है कि शून्य का अविष्कार भारत मे हुआ और इस उत्पत्ति ने संख्याओ की एक नई प्रणाली को जन्म दिया1 । आज हम जिस प्रणाली का प्रयोग कर रहे है वह उसी की देन है। आधुनिक दशमलव अंक प्रणाली की उत्पत्ति का श्रेय भारतीय गणितज्ञ आर्यभट्ट(498 सी0ई0) को जाता है। आर्यभट्ट ने अंकों के लिए संस्कृत शब्दों का प्रयोग किया था। आर्यभट्ट ने लिखा है-“स्थान से स्थान मूल्य दस गुना है।
Article Details
How to Cite
1.
बाजपेईप. आधुनिक युग मे संख्याओ का अद्वितीय रूप तथा उनका महत्व. ANSDN [Internet]. 24Jul.2014 [cited 3Jun.2026];2(01):215-6. Available from: https://anushandhan.in/index.php/ANSDHN/article/view/1018
Section
Review Article